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हर शहर हर गली में हमें मिल जाती है...

 हर शहर हर गली में  हमें मिल जाती है।,

देखकर उसे होंठों  पे मुस्कान खिल जाती  है,

उसे देख थकान छूमंतर हो जाती  है, 

नये शहरों में नये दोस्तों से पहचान करवाती है,,

दो अजनबीयों को मिलाने का बहाना बन जाती है, 

मिलकर दोस्तों साथ कई फसाने बनाती है, 

हर शहर हर गली में हमें मिल जाती है।। 

एक यही तो है . जो घर से बाहर भी अपनेपन का एहसास दिलाती है, 

सुख और दुःख  दोनो में हमारा साथ निभाती है, 

बडी देर से सोच रहे  होंगे अाप, 

आखिर है कौन एसी शक्शियत जो हमको इतना याद आती है, 


तो बतादें आपको कि  जिसकी इतनी  तारीफ़ सुनी आपने वो चाय के नाम से जानी जाती है।।

चलो फिर वही चलते हैं...

 चलो फिर वही चलते हैं।

चलो फिर एक नई शुरुआत करते हैं। 

मैं और तुमको हम में बदलते हैं।

 फिर एक नई कहानी लिखते हैं।

 चलो फिर वही चलते हैं ।


भूल जाना चाहती हूं,सारे गिले शिकवे।

 मिटा देना चाहती हूं,वो सारी बे इत्तिफाकी।

तुम फिर मेरी नादानी को नादानी समझना ।

नहीं पसंद बहुत बड़प्पन मुझे।

 फिर मेरी गलतियों पर समझाना मुझे ।

नहीं पसंद तेरा वह सुनाना मुझे।सारी नाराजगी पर मिट्टी डालते हैं।

 चलो फिर पहले जैसे बनते हैं।

 चलो फिर वही चलते हैं ।


कुछ तुम बदले थे कुछ हम बदले थे ।

दिल की दफनी बातें बोल दिया करते थे ।

चलो थोड़ा कम अकड़ते हैं ।

तुम कुछ नैन लालिमा कम करना।

 चलो फिर सब बोल दिया करेंगे।

 रिश्ते की डोर को चलो थोड़ी ढील देते हैं ।

चलो फिर वही चलते हैं।

वो कंधे जिन पर बैठकर सारा जहां देखा...

 वो कंधे जिन पर बैठकर सारा जहां देखा है

​पापा के सिवा किसी और को इतना ऊंचा कहां 

​वो कंधे जिन पर बैठकर सारा जहां देखा है 

वो कंधे जिन पर बैठकर सारा जहां देखा है

​पापा के सिवा किसी और को इतना ऊंचा कहां देखा है 

चलते थे कदम उनके और सैर  हमारी हो जाती थी 

कंधे पर ही उनके नींद सारी हो जाती थी

 उनकी आंखों में अपने ख्वाबों का आसमां देखा है 

 वो कंधे जिन पर बैठकर सारा  जहां देखा है

 

वो कंधे जिन पर बैठकर सारा जहां देखा है

​पापा के सिवा किसी और को इतना ऊंचा कहां देखा

मां के घर में होने से घर में जन्नत होती है और ,

पापा घर में  हों तो पूरी बच्चे की हर मन्नत होती है ,

थकान का नामों निशान उनके चेहरे पर कभी कहां देखा है ,


वो कंधे जिन पर बैठकर सारा जहां देखा है

​पापा के सिवा किसी और को इतना ऊंचा कहां देखा है।


बुझने की आश...

 अब सब कुछ अब्तर सा लगता है।

ना वो अश्क में बहता है।

ना वो खुशी में छलकता है।

अब आतिश सी लगी हुई है।

बुझने की आश सी है।

एक बूंद में भी राहत सी है।

मेघ के इंतजार में है।

अब सब कुछ अब्तर सा लगता है।

समिटने की आश सी है।

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